Sunday, 13 April 2014

कुछ और कविताएँ


1
कहो कवि

क्या आपने कहा है कभी

किसी बदसूरत आदमी की हँसी को खूबसूरत

कभी किसी बदसूरत बच्चे की तारीफ की है

कल्पना की है कभी

कि पत्नी के दाँत निकले होते बाहर

और वह कोएले की तरह काली होती

कि सारे तस्वीरों में आपके बच्चे की कल्पना

सुंदर ही क्यों थी

क्या आपने सोचा है कभी

कि ऐसा सोचते ही क्यों

आपके मुंह का स्वाद हो जाता है

नीम की तरह कड़वा

कि क्यों आप बगलें झांकने लगते हैं

सोचते ही ऐसा
 

कहो कवि !

2

नेता

मुसलमान धरती पर

हिंदू धरती पर

 

धरती पर दलित

धरती पर जाट

 

पर नेता -

धरती से ऊपर !!


3

धूप

ठुमक ठुमक आती खुशी

सुबक सुबक दु:ख

खुशी और दुख के झमेले से दूर

धूप आती नंगे पाँव

पसीने से तरबतर

आम पेड़ के नीचे ठहर

ज़रा सुस्ताती-बतियाती

ताकती टुकुर-टुकुर

केरियों की थाह लेती

हाथों का तकिया बना

लेती एक छोटी सी नींद !
 
 
 
4
नाटक का पटाक्षेप
एक
चौड़ा माथा
उन्न्त ललाट
झक सफेद दाढ़ी
झक सफेद बाल
चमकता चेहरा
गाल टमाटर से लाल
बोलना शुरु
माने मंच से उठा परदा
और चुप हुए मतलब
गिर गया परदा
 
दो
शुक्रिया ज़नाब
आँखें चौड़ी किए
उकड़ूँ बैठे
घुटनो को हाथों से दबाए
किस मतलब से बैठे हैं आप
क्या देखना चाहते हैं
और क्या सुनना –
मंच पर कोई नहीं अब
है बस शून्य
नाटक का पटाक्षेप हो चुका है !!
5
जै बोलिए स्त्री विमर्श की

एक

नंगी है
उस स्त्री की पीठ
लेखक का दाहीना हाथ
उसकी पीठ पर है

स्त्री की कविताओं में
पुरुषों को गालियाँ वर्जित नही है

लेखक ने अभी-अभी घोषणा की है
उस स्त्री की कविताएँ महान है

कार्यक्रम खत्म हो चुका है
लेखक की आखें उस स्त्री को ढूंढ रही है...

दो

कार्यक्रम के बाद
खाने का कार्यक्रम है
खाने के पहले शराब का इंतज़ाम है

गोल मेजों के चारों ओर
लेखकगण विराजमान हैं
:-: कुर्सियाँ हैं
दूसरे और चौथे पर
स्त्रियाँ विद्यमान हैं

कम उम्र लड़कियाँ और लड़के
परोस रहे हैं शराब
चर्चा है
ठहाके हैं

मयखाने में सब बराबर है !

तीन

जो ना पीये शराब
तो पिछड़ा है
जो टकराए जाम पर पाम
स्त्री विमर्श का हक
केवल और केवल उसी का है ..

जै बोलिए स्त्री विमर्श की !!


भास्कर चौधुरी

No comments:

Post a Comment