Thursday, 13 February 2014

कविताएँ



राहत शिविर
मरे कोई एक
कोई बात नहीं
कोई दो कोई तीन
कोई बात नहीं
पचास या सौ
तो होने ही चाहिए
कम से कम
हज़ार हो तो
क्या बात है
मौत का ग्लेमर तो तभी है
तभी तो शुरु हो सकेगी
बचे हुओं की फिक्र !!
 

                भास्कर चौधुरी




गठरी
वह औरत
सिर पर गठरी लादे
चल रही है

औरत के वजन के करीब है
गठरी का वजन
सीधे नहीं पड़ रहे
उसके कदम
पर वह चल रही है
बरसों से
बिना रुके

बस जब थकती है तो
हाथ कमर पर रख लेती है !

                     भास्कर चौधुरी


 

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